जशपुरनगर। छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ी वादियों और हरियाली के लिए पहले से ही प्रसिद्ध रहा है, लेकिन अब यह जिला बागवानी के क्षेत्र में भी नई पहचान बना रहा है। जिले के सन्ना और मनोरा विकासखंड में बड़े पैमाने पर हो रही नाशपाती की खेती किसानों के लिए किसी "ग्रीन गोल्ड" से कम साबित नहीं हो रही है। बेहतर उत्पादन, बाजार में अच्छी कीमत और बढ़ती मांग ने नाशपाती को जिले की सबसे लाभकारी बागवानी फसलों में शामिल कर दिया है। इसका सीधा लाभ किसानों की आर्थिक स्थिति पर दिखाई दे रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि की नई तस्वीर उभर रही है।
जशपुर जिले के सन्ना और मनोरा क्षेत्र की जलवायु, ऊंचाई और उपजाऊ मिट्टी नाशपाती उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। यही वजह है कि यहां तैयार होने वाली नाशपाती अपने बेहतरीन स्वाद, प्राकृतिक मिठास, आकर्षक आकार और उच्च गुणवत्ता के कारण प्रदेश सहित पड़ोसी राज्यों के बाजारों में भी अलग पहचान बना चुकी है। हर वर्ष व्यापारियों की मांग बढ़ने से किसानों को अपनी उपज बेचने में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।
उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से किसानों ने नाशपाती उत्पादन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वैज्ञानिक तरीके से बागानों का रखरखाव, समय पर सिंचाई, पौध संरक्षण और पोषण प्रबंधन के कारण एक-एक पेड़ से लगभग 400 से 500 किलोग्राम तक उत्पादन प्राप्त हो रहा है। उत्पादन बढ़ने के साथ किसानों का आत्मविश्वास भी बढ़ा है और अब कई किसान पारंपरिक खेती छोड़कर बागवानी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
बाजार में नाशपाती का थोक मूल्य 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलने से किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां किसान धान, मक्का और अन्य पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहते थे, वहीं अब नाशपाती की खेती से लाखों रुपये की आमदनी अर्जित कर रहे हैं। अच्छी कमाई होने से किसान अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं, आधुनिक कृषि उपकरण खरीद रहे हैं तथा अपने जीवन स्तर में भी सुधार कर रहे हैं।
सन्ना क्षेत्र के एक प्रगतिशील किसान ने बताया कि पहले पारंपरिक खेती में अधिक मेहनत के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं मिलता था। उद्यानिकी विभाग की सलाह पर नाशपाती का बागान लगाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई। अब हर सीजन में अच्छी आय हो रही है और परिवार आर्थिक रूप से पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है।
नाशपाती की बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि व्यापारी स्वयं किसानों के बागानों तक पहुंचकर फलों की खरीद कर रहे हैं। इससे किसानों को परिवहन की अतिरिक्त लागत से राहत मिल रही है और उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य भी आसानी से प्राप्त हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नाशपाती की खेती केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जशपुर में कृषि-पर्यटन (एग्रो टूरिज्म) की संभावनाएं भी तेजी से विकसित हो रही हैं। फलों से लदे खूबसूरत बागान पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। यदि इस दिशा में योजनाबद्ध प्रयास किए जाएं तो भविष्य में जशपुर बागवानी पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बन सकता है।
उद्यानिकी विभाग किसानों को उन्नत पौधे, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण तथा बागानों के बेहतर प्रबंधन की जानकारी लगातार उपलब्ध करा रहा है। विभाग के सहयोग से हर वर्ष नाशपाती के रकबे में वृद्धि हो रही है और नए किसान भी इस खेती से जुड़ रहे हैं।
जशपुर की यह सफलता साबित करती है कि यदि किसानों को सही मार्गदर्शन, आधुनिक तकनीक और बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए तो बागवानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। आज सन्ना और मनोरा के नाशपाती उत्पादक किसान पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। जशपुर की "ग्रीन गोल्ड" कही जाने वाली नाशपाती न केवल किसानों के जीवन में खुशहाली ला रही है, बल्कि जिले को कृषि और बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान भी दिला रही है।