*“क्या सुप्रीम कोर्ट ही पूरा देश चलाए?”—सड़कों, पुलों और बिजली तारों की मरम्मत को लेकर व्यापक निर्देश मांगने वाली याचिका पर शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी, याचिका खारिज*
नई दिल्ली, 13 मार्च 2026 । देश की सर्वोच्च अदालत ने सड़कों, पुलों, बिजली के तारों सहित अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की मरम्मत और रखरखाव को लेकर दायर एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में अदालत से पूरे देश में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को दुरुस्त रखने तथा आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या आप चाहते हैं कि हम पूरा देश चलाएं?” न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मुद्दे मुख्य रूप से प्रशासनिक और नीतिगत विषय हैं, जिनका समाधान केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन द्वारा किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि न्यायपालिका का काम हर प्रशासनिक कार्य में हस्तक्षेप करना नहीं है। यदि किसी क्षेत्र में सड़कें खराब हैं, पुलों का रखरखाव नहीं हो रहा है या बिजली के तारों से खतरा है, तो उसके लिए संबंधित विभागों और स्थानीय निकायों के पास शिकायत दर्ज कराई जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में देशभर के लिए एक समान व्यापक निर्देश जारी करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दावा किया था कि कई स्थानों पर खराब सड़कों, जर्जर पुलों और खुले या लटकते बिजली के तारों के कारण लोगों की जान को खतरा बना रहता है। इसलिए अदालत से अनुरोध किया गया था कि वह केंद्र और राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट करते हुए याचिका खारिज कर दी कि प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करना न्यायालय का कार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के मामलों में संबंधित सरकारों और विभागों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर स्थानीय स्तर पर समाधान खोजा जाना चाहिए।