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धर्म की आड़ में राजनीति या असली मुद्दों से भागना? जशपुर में ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ पर भड़का विपक्ष

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जशपुर

विपक्ष ने सरकार की नीतियों और हालिया 'धर्म स्वतंत्रता अधिनियम' पर तीखा हमला बोला है । उन्होंने  आरोप लगाया कि राज्य सरकार बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और विकास के विजन की कमी को छिपाने के लिए धर्म का सहारा लेकर जनता का ध्यान भटकाने की राजनीति कर रही है।

कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष मनोज सागर यादव ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा  कि जशपुर में कभी भी धर्म के नाम पर अशांति नहीं रही, यहाँ के लोग हमेशा से मिल-जुलकर रहते आए हैं। "जब बेरोजगारी और किसानों की आय पर जवाब देते नहीं बनता, तब धर्म के नाम पर माहौल गर्म किया जाता है। यह विकास का नहीं, बल्कि नफरत और विभाजन का एजेंडा है।"

 1954 के बाद से ईसाई समाज ने जशपुर के सुदूर अंचलों में शिक्षा की अलख जगाने वाले मिशन स्कूलों का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर सीधा हमला बोला।

 उन्होंने  कहा, कि "आज जिस ईसाई समाज ने स्कूलों,  स्वास्थ्य और सभी समाज में बिना भेद भाव के जागरूकता लाया  उसी समाज को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, उन्होंने इस इलाके को अंधेरे से निकालकर रोशनी दी है।  सबसे बड़ा पाखंड तो यह है कि मुख्यमंत्री खुद लोयोला हायर सेकेंडरी स्कूल जैसे मिशन स्कूल से पढ़कर निकले हैं। जिस व्यवस्था ने उन्हें अवसर दिया, काबिल बनाया, आज उसी सिस्टम पर उंगली उठाना राजनीति का सबसे निचला स्तर है।"

" कांग्रेस के जिलाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक यू डी मिंज ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि जशपुर की जनता अब सब समझ चुकी है। "डर दिखाकर या कानून का दबाव बनाकर लोगों को बांटा नहीं जा सकता। जशपुर न बिकाऊ है, न डरने वाला और न ही बंटने वाला है।" 

उन्होंने आह्वान किया कि हर गाँव से अब धर्म के नाम पर राजनीति के बजाय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मांग उठनी चाहिए।

 जशपुर की साझा संस्कृति और एकता को अटूट बताते हुए संकल्प लिया गया कि यहाँ की पहचान को कोई नहीं बदल सकता। "यह धरती एकता की थी, है और हमेशा रहेगी।"

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